Scheduled Tribes

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( मध्यप्रदेश की जनजातियाँ)

इस पोस्ट में मध्यप्रदेश की जनजातियों से संबंधित सामान्य ज्ञान पर जानकारी प्रस्तुत की गई है,जो लगभग सभी परीक्षाओं के लिए उपयोगी
होगी | Mppsc Psc परीक्षाओं में और mp-online या प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अक्सर इस टॉपिक्स पर प्रश्न पूछे जाते हैं  

 मध्य प्रदेश में एक अच्छी खासी जनसंख्या जनजातीय है। इस प्रदेश की जनसंख्या का लगभग २०.२7 % जनजातीय लोग हैं। (लगभग 1.२२ करोड़, २००1 की जनगणना के अनुसार)। मध्य प्रदेश में 46 अनुसूचित जनजातियाँ हैं दि शेड्यूल्ड परियाज एंड ट्राइब्स कमीशन” ने जनजातियों को चार वर्गों से बांटा है। इनमें से सबसे अविकसित जनजातियों के रहवासी क्षेत्रों को “शेड्यूल्ड एरिया” या “अनुसूचित क्षेत्र” घोषित कर दिया गया है। मध्यप्रदेश में सात विशेष पिछड़ी जनजातियां हैं। इनका रहन-सहन, खान-पान, आर्थिक स्थिति, शिक्षा का प्रतिशत जनजातियों के प्रादेशिक औसत से कम है।

 मध्य प्रदेश प्रमुख जनजातियाँ –

आइये  इनके बारे में विस्तार से जानते हैं –

 गोंड 

मध्यप्रदेश की जनजातियाँ

गोंड  मध्य प्रदेश की सबसे महत्त्वपूर्ण जनजाति है, जो प्राचीन काल के गोंड राजाओं को अपना वंशज मानती है। यह एक स्वतंत्र जनजाति थी, जिसका अपना राज्य था और जिसके 52 गढ़ थे। मध्य भारत में 14वीं से 18वीं शताब्दी तक इसका राज्य रहा था। मुग़ल शासकों और मराठा शासकों ने इन पर आक्रमण कर इनके क्षेत्र पर अधिकार कर लिया और इन्हें घने जंगलों तथा पहाड़ी क्षेत्रों में शरण लेने को बाध्य किया।

गोंड  की प्रमुख उपजातियाँ

 अगरिया  

  – लोहे का काम करने वाले गोंड

 परिधान –

  –  मंदिरों में पूजा पथ तथा पुजारी का काम करने वाले गोंड

 कोईलiभुति

  – नाचने वाले गोंड 

 ओझा

  – पंडिताई तथा तांत्रिक क्रिया करने वाले गोंड

 सोलाहस

  – बढ़ईगिरी का काम करने वाले गोंड 

 आबादी

गोंडों की लगभग 60 प्रतिशत आबादी मध्य प्रदेश में निवास करती है। शेष आबादी का अधिकांश भाग ‘संकलन’, आन्ध्र प्रदेश एवं उड़ीसा में बसा हुआ है। गोंड जनजाति के वर्तमान निवास स्थान मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ राज्यों के पठारी भाग, जिसमें छिंदवाड़ा, बेतूल, सिवनी और माडंला के ज़िले सम्मिलित हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी दुर्गम क्षेत्र, जिसमें बस्तर ज़िला सम्मिलित है, आते हैं। इसके अतिरिक्त इनकी बिखरी हुई बस्तियाँ छत्तीसगढ़ राज्य, गोदावरी एवं बैनगंगा नदियों तथा पूर्वी घाट के बीच के पर्वतीय क्षेत्रों में एवं बालाघाट, बिलासपुर, दुर्ग, रायगढ़, रायसेन और खरगोन ज़िलों में भी हैं। उड़ीसा के दक्षिण-पश्चिमी भाग तथा आन्ध्र प्रदेश के पठारी भागों में भी यह जनजाति रहती है।

निवास

गोंड जनजाति का निवास क्षेत्र 17.46 डिग्री से 23.22 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 80 डिग्री तथा 83 डिग्री पूर्वी देशांतरों के बीच है।

शारीरिक गठन

गोंड जनजाति के लोग काले तथा गहरे भूरे रंग के होते हैं। उनका शरीर सुडौल होता है, किंतु अंग प्राय: बेडौल होते हैं। बाल मोटे, गहरे और घुंघराले, सिर गोल, चहरा अण्डाकर, आँखें काली, नाक चपटी, होंठ मोटे, मुँह चौड़ा, नथुने फैले हुए, दाढ़ी एवं मूछँ पर बाल कम एवं क़द 165 सेमी. होता है। गोंडों की स्त्रियाँ पुरुषों की तुलना में क़द में छोटी, शरीर सुगठित एवं सुन्दर, रंग पुरुषों की अपेक्षा कुछ कम काला, होंठ मोटे, आँखें काली और बाल लम्बे होते हैं।

भोजन

गोंड अपने वातावरण द्वारा प्रस्तुत भोजन सामाग्री एवं कृषि से प्राप्त वस्तुओं पर अधिक निर्भर रहते हैं। इनका मुख्य भोजन कोदों, ज्वार और कुटकी मोटे अनाज होते हैं, जिन्हें पानी में उबालकर ‘झोल’ या ‘राबड़ी’ अथवा ‘दलिया’ के रूप में दिन में तीन बार खाया जाता है। रात्रि में चावल अधिक पसन्द किये जाते हैं। कभी-कभी कोदों और कुटकी के साथ सब्जी एवं दाल का भी प्रयोग किया जाता है। कोदों के आटे से रोटी[1] भी बनाई जाती है। महुआ, टेंगू और चर के ताज़े फल भी खाये जाते हैं। आम, जामुन, सीताफल और आंवला, अनेक प्रकार के कन्द-मूल एवं दालें व कभी-कभी सब्जियाँ भी खाने के लिए काम में लाये जाते हैं।

वस्त्राभूषण

आरम्भ में गोंड जनजाति के लोग या तो पूर्णत: नंगे रहते थे अथवा पत्तियों से अपने शरीर को ढंक लेते थे। अब 3-4 दशकों से वे वस्त्रों का प्रयोग करने लगे हैं, किंतु वस्त्र कम ही होते हैं। अधिकांशत: पुरुष लंगोटी से अपने गुप्तांगों एवं जांघों को ढंक लेते हैं। कभी-कभी सिर में एक अंगोछे के प्रकार का कपड़ा भी बांध लेते हैं। कुछ लोग पेट और कमर ढंकने के लिए अलग से पिछौनी लपेट लेते हैं। स्त्रियाँ धोती पहनती हैं, जिससे शरीर के ऊपर और नीचे का भाग ढंक जाता है। ये चोली नहीं पहनतीं। छातियाँ खुली रहती हैं। सर्दियों में शरीर को ढंकने के लिए ऊनी कम्बल व मोटे टाट का कपड़ा काम में लाया जाता है।

धार्मिक जीवन

गोंड जनजाति के लोग धार्मिक विश्वास में टोटम का अत्यंत महत्वपूर्ण स्तन है प्रत्येक क्षेत्र अपने विशेष टोटम की पूजा करता है इसके अल्वा प्राचीन देवी देवताओं और आत्मा की पूजा का भी प्रचलन है
बूढ़ादेव इनके प्रमुख देवता है इसके अतिरिक्त दूल्हा देव ,सूरज देव नारायण देव आदि बी महत्वपूर्ण देवता है हिन्दू धर्म के प्रभाव स्वरुप गोंड लोग शिव काली हनुमान आदि देवताओं की भी पूजा करते है।

गोंडो में प्रचलित विवाह 

गोंडो में प्रचलित नृत्य  

 गोंडो में प्रचलित  पर्व  

 पठौनी विवाह 

 सेला 

 बिदरी    

 चढ़ विवाह 

 करमा 

 करमा

 लमसेना विवाह 

 भड़ौनी 

 बक पंथी

 

 बिरछा

 मड़ई 

  

 कहरवा

 हरदिली

 

  सजनी

 छेरता 

 

 सुआ

  नवाखानी

 

 दीवानी 

 मेघनाद  

 

गोंडी मान्यताएँ

भारतीय समाज के निर्माण में गोंड संस्कृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। गोंडी संस्कृति की नींव पर भारतीय संस्कृति खड़ी है। गोंडवाना भूभाग में निवासरत गोंड जनजाति की अदभुत चेतना उनकी सामाजिक प्रथाओं, मनोवृत्तियों, भावनाओं आचरणों तथा भौतिक पदार्थों को आत्मसात करने की कला का परिचायक है, जो विज्ञानं पर आधारित है। समस्त गोंड समुदाय को पहांदी कुपार लिंगो ने कोया पुनेम के मध्यम से एक सूत्र में बंधने का काम किया। धनिकसर (धन्वन्तरी) नामक गोंड विद्वान् ने रसायन विज्ञान अवं वनस्पति विज्ञान का तथा हीरा सुका ने सात सुरों का परिचय कराया था ।

   भील   

भील  भारत की एक प्रमुख जनजाति हैं। जनसंख्या की दृस्टि से भील मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति है   मध्य प्रदेश के भील ‘जरायम पेशा’घुमक्कड़ हैं  यह जाति राजस्थान राज्य की मुख्य जातियों में से एक है। इस जाति के लगभग 39 प्रतिशत लोग, जो राजस्थान में बनस्वारा गाँव में बसते हैं, वे सभी भील जाति के हैं। यह भारत की तीसरी बड़ी आदिवासी जाति है। आर्थिक रूप से इस जाति के लोग स्थायी रूप से कृषक, सामाजिक दृष्टि से पितृ-सत्तात्मक जनजाति एवं परम्परागत रूप से एक अच्छे तीरंदाज होते हैं। वर्तमान समय में यह जनजाति विकास के विभन्न चरणों में मानी जाती है। मध्य प्रदेश के भील ‘जरायम पेशा’घुमक्कड़ हैं, ख़ानदेश के कृषक, गुजरात के आखेटक और कृषक तथा राजस्थान और महाराष्ट्र में ये भ्रमणकारी आखेटक, स्थायी कृषक अथवा मज़दूरी में लगे हुए हैं।

भीलो की प्रमुख उपजातियाँ

 भिलाला      रथियास  बरेला बैगास  पटलिया

निवास क्षेत्र

भील शब्द की उत्पत्ति “बिल” से हुई है जिसका द्रविड़ भाषा में अर्थ होता हैं “धनुष”। भील जाति दो प्रकार से विभाजित है- 1.उजलिया/क्षत्रिय भील- उजलिया भील मूल रूप से वे क्षत्रिय है जो सामाजिक/मुगल आक्रमण के समय जंगलो में चले गए एवं मूल भीलों से वैवाहिक संबंध स्थापित कर लेने से स्वयं को उजलिया भील कहने लगे मालवा में रहने वाले भील वही है। इनके रिति रिवाज राजपूतों की तरह ही है। इनमें वधूमूल्य नहीं पाया जाता और ना ही ये भीली भाषा बोलते है। इनके चेहरे और शरीर की बनाबट, कद काठी प्राचीन राजपूतों से मिलती है। 2.लंगोट भील-ये वनों में रहने वाले मूल भील है इनके रीति रिवाज आज भी पुराने है। इनमें वधूमूल्य का प्रचलन पाया जाता है। म.प्र. के निमाड में रहने

स्त्रियाँ

भील जाति की स्त्रियाँ बहुत ही संकीर्ण विचारों की होती हैं, परन्तु उन को हाथी दाँत, लाख, चाँदी और काँसे के गहने पहनने का बहुत शौक़ होता है। किसी भी भील औरत को ज़रूरी गहनों के बिना कभी नहीं देखा जा सकता। वह सदैव ही कुछ न कुछ गहने के रूप में अवश्य पहने रहती हैं। ‘बोरला’, जिसे वे माथे पर पहनती हैं; ‘झीला’, जो सिर के सिरे से कानों पर लटकते हैं। फिर ‘पंडे’, जो कान के बाहरी उपरी हिस्से में तीन की संख्या में पहने जाते हैं; फिर ‘कर्णफूल’ जो कानों में छेद कराकर पहने जाते हैं; फिर ‘तुस्सा’ या ‘बज़ार बट्टी’ अर्थात चूड़ियाँ भी होती हैं। इस जाति के लोगों में चाहे लड़की हो या लड़का पढ़ाने के लिए किसी को भी उत्साहित नहीं किया जाता है। इसलिए उनके शिक्षित होने की संख्या बहुत ही कम पाई जाती है। इसी कारण लोग उनका फ़ायदा उठाते हैं और वे एक प्रकार के बन्धुवा मज़दूरों के समान काम करते हैं।

भील जनजाति के लोग

भील सामान्यत: छोटे क़द के होते हैं, औसत मध्यम क़द 163 सेमी. का, सिर की लम्बाई 181.1 सेमी. तथा चौड़ाई 137.4 सेमी. होती है। कपाल निर्देशांक मध्यम, नाक मध्यम रूप से चौडी होती है। चेहरा गोलाई लिए चौड़ा और शरीर पूर्णत: विकिसित होता है। इनका रंग हल्के भूरे से गहरा काला, बाल चिकने तथा काले, किंतु घुंघराले नहीं होते। आँख का रंग कत्थई से गहरा भूरा होता है। आँख की पुतली बड़ी, सिर सीधा और चौड़ा, होंठ पतले से मोटे, ठुड्डी गोल से अण्डाकार तक, दाढ़ी-मूँछ कम, शरीर पर बाल कम, भौंहों के ऊपर की हड्डियाँ, पूर्णत: विकसित और शरीर सुगठित होता है। भील स्त्रियों का रंग सुन्दर, हल्का गेहूँआ, सुगठित शरीर, गोल चेहरा, पतले होंठ, सामान्यत: छरहरा-भरा बदन होता है। ये हंसमुख, मृदुभाषी और चलते समय बड़ी आकर्षक लगती हैं।

भोजन

इस जाति के लोगों का मुख्य भोजन गेहूँ, चावल, मक्का, कोदों, दाल तथा सब्ज़ियाँ आदि होती हैं। उत्सव के अवसर पर अथवा शिकार करने पर बकरे या भैंसे का मांस, मुर्गी के अण्डे, मछलियाँ भी खायी जाती हैं। यदा-कदा दूध अथवा छाछ का भी प्रयोग किया जाता है। ये दो बार भोजन करते हैं। प्रात:काल के भोजन में चावल, कोदों तथा सब्जी या दाल खाते हैं और शाम को मक्का की रोटी तथा प्याज या कोई सब्जी। महुआ की बनी शराब तथा ताड़ का रस खूब पिया जाता है। तम्बाकू और गाँजे का भी सेवन किया जाता है। महुआ के फल, सीताफल, आम, बेर आदि का उपयोग भी किया जाता है।

शिक्षा की स्थिति

भील लोग स्वभाव से निडर, ईमानदारी, अतिथि सत्कार करने वाले, अपने वचन के पक्के और सीधे-सादे होते है, किंतु वर्तमान में उनका सम्पर्क नगरीय क्षेत्रों से होने के कारण अब वे भी बहुत चतुर, चालाक बन गए हैं। इनमें शिक्षा का प्रचार भी हो गया है। आधुनिक वेश-भूषा भी ये लोग पहनने लगे हैं तथा अधिक सभ्य होते जा रहे हैं। हालाँकि वे पिछड़ी हुई जाति के हैं और बहुत ही निर्धन होते हैं, तौ भी अपनी आँखों की चमक से हमेशा ये हँसमुख और खुशहाल प्रतीत होते हैं।

वाले अधिकांश जनजाति यही है।

धार्मिक जीवन 

भीलो का धर्म आत्मा वादी हे इनके प्रमुख देवता राजपंथा है जानवरों में ये लोग घोड़े और  सर्प की पूजा करते हैं हिन्दू धर्म के प्रभाव के फलस्वरूप भील  लोग शिव काली हनुमान आदि देवताओं की भी पूजा करते है। इनमे पहाड़ ,वन ,पानी, और फसलों ,के भी अलग अलग देवता होते हैं इनके द्वारा की गयी कृषि को चिमiता कहते हैं 

भीलो में प्रचलित विवाह  भीलो में प्रचलित नृत्य  

भीलो में प्रचलित  पर्व  

 भगोरिया

भगोरिया 

 डोहा

गल 

 

 बड़वा 

चलवणी

 

 घूमर 

जातरा

  

 गोरी

गोल घेघढ़ा

 

  

 

 

 


  कोरकू  

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कोरकू’ शब्द द्रविण भाषा के कोरक शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है- ‘किनारा’। कोरकू का एक अन्य अर्थ मानव भी होता है। ये लोग बोलचाल की इस जाति के लोग नर्मदा और ताप्ती नदी के किनारे रहते हैं भाषा में कोरकू बोली का प्रयोग करते हैं। मवासी इन लोगों की उपबोली है।कोरकू जनजाति के लोग मध्यप्रदेश में सतपुड़ा पर्वतमाला के जंगलों से लगे छिन्दवाड़ा, बैतूल जिले की भैंसदेही और चिचोली तहसील में, होशंगाबाद जिले की हरदा, टिमरनी और खिड़किया तहसील के गाँवों में निवास करती है। इसके अतिरिक्त कोरकू महाराष्ट्र में अकोला, मेलघाट तथा मोर्शी तालुका में भी रहते हैं

कोरकुओं की प्रमुख उपजातियाँ
 नहाला   मोवासिरुमा बवारी बोडोया 

उत्पत्ति

कोरकू लोग अपनी उत्पत्ति रावण या महादेव से मानते हैं। इन लोगों में ऐसा माना जाता है कि एक समय लंका का राजा रावण इस स्थान पर भ्रमण करने आया और यहाँ किसी मानव को न देखकर अत्यंत दुखी हुआ। उसने भगवान शिव को याद किया, तब शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने कोरकू जनजाति को जन्म दिया।

निवास व विभाजन

इस जाति के लोग मध्य प्रदेश में बैतूल, छिंदवाड़ा, खण्डवा और खरगौन ज़िले में निवास करते हैं। ‘बंडोया’, ‘रूमा’ और ‘मवासी’, कोरकू की उपजातियाँ हैं। कोरकू जनजाति को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. राय कोरकू – इस वर्ग के लोग सम्पन्न स्थिति में हैं।
  2. पथरिया कोरकू -ये लोग गरीबी की अवस्था में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

जीवनचर्या

कोरकू जनजाति के लोग शिकार एवं कंदमूल खाकर अपना जीवन-यापन करते हैं। इन लोगों को भोज्य पदार्थों में चूहा विशेष तौर पर प्रिय है। इनके प्रमुख देवी-देवता डोंगर देव, मटका देव, चंद्रमा एवं महादेव हैं। इनमें क्रय विवाह एवं अपहरण विवाह की प्रथा प्रचलित है। कोरकू जनजाति में ‘कोरकू थापटी नृत्य‘ विशेष अवसरों पर किया जाता है।

अर्थव्यवस्था

कोरकू की आजीविका का मुख्या साधन कृषि एवं आखेटन हैं , किन्तु बहुत कम कोरकू भूस्वामी हैं ।आखेटन में ये बहुत निपूर्ण होते है तथा समूह में आखेटन करते हैं इसके अतिरिक्त पशुपालन ,मतस्य पालन ,पशुपालन एवं वनोपज संग्रह भी इनके जीवन यापन के साधन हैं ।

धार्मिक जीवन 

कोरकू स्वयं को हिन्दू मानते हैं ये लोग महादेव एवं चन्द्रमा की पूजा करते हैं डोगर देव भतुआ देव एवं गांव के देव इनके प्रमुख देवता है ये लोग गुड़ीपड़वा .आखातीज .दशहरा ,दिवाली ,होली जसे हिन्दू त्यौहार भी मानते हैं भूमिया और पडियार कोरकुओं के सम्मानित व्यक्ति हैं
मृतक संसकर में सिडोली प्रथा प्रचलित है मृतकों को दफनाया जाता है और मृतकों की स्मृति में लकड़ी का एक स्तंभ गाड़ते हैं

 

कोरकुओं  में प्रचलित विवाह  

कोरकुओं  में प्रचलित नृत्य  

कोरकुओं में प्रचलित  पर्व  

लमझेना प्रथा या घर दामाद

 थापटी नृत्य

गुड़ीपड़वा

चिथोडा

आखातीज

राजी -बजी प्रथा

दशहरा 

 तलाक अथवा विवाह प्रथा 

 

दिवाली

  हट्ट विबाह 

 

होली

 अंतर्विवाह 

पाला 

 

 

डोड़वली 

 

 


  बैगा  

बैगा, भारत के मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं झारखण्ड प्रदेशों में पायी जाने वाली जनजाति है। मध्य प्रदेश के मण्डला [[डिंडोरी]] तथा बालाघाट जिलों में बैगा लोग बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं। बिझवार, नरोतिया, भरोतिया, नाहर, राय भैना और काढ़ भैना इनकी कुछ उपजातियाँ हैं। सन् 1981 की जनगणना के अनुसार उनकी संख्या 248,949 थी।बैगा लोगों को इसी आधार पर गलती से गोंड भी समझ लिया जाता है जबकि एक ही भौगोलिक क्षेत्र यह सही है कि बैगा अधिकांशत: गुनिया और ओझा होते हैं किन्तु ऐसा नहीं है कि गुनिया और ओझा अनके वितरण क्षेत्र में बैगा जाति के ही पाए जाते हैं।में पायी जाने वाली ये दोनों जातियां क्रमश: कोल और द्रविड़ जनजाति समूहों से सम्बद्ध हैं। इन दोनों जातियों में विवाह संबंध होते हैं क्योंकि दोनों जातियां हजारों वर्षों से साथ-साथ रह रही हैं। गोंडों के समान ही बैगाओं में भी बहुत से सामाजिक संस्तर है। राजगोंडों के समान ही बैगाओं में भी विंझवार बड़े जमींदार हैं और उन्हें राजवंशी होने की महत्ता प्राप्त हैं। मंडला में बैगाओं का एक छोटा समूह भरिया बैगा कहलाता है। भारिया बैगाओं को हिन्दू पुरोहितों के समकक्ष ही स्थान प्राप्त है। ये हिन्दू देवताओं की ही पूजा सम्पन्न करते हैं, आदिवासी देवताओं की नहीं। मंडला जमीन की सीमा संबंधी विवाद का बैगाओं द्वारा किया गया निपटारा गोंडों को मान्य होता है।

बालाघाट के बैगाओं की बोली में भी छत्तीसगढ़ी का प्रभाव स्वाभाविक रूप से देखने को मिलता है।
ग्रिथर्सन का यह कहना अर्थ रखता है कि पहले बैगा अधिकांशत: छत्तीसगढ़ के मैदान में फैले थे और वहां से ही ये हैहयवंशी राजपूतों द्वारा दुर्गम क्षेत्रों की ओर भगाए गए। भुइयां के अतिरिक्त, भनिया लोगों का भी संबंध बैगाओं से जोड़ा जाता है। बैगाओं की एक शाखा मैना राजवंश ने किसी समय उड़ीसा में महानदी के दक्षिण में बिलहईगढ़ क्षेत्र पर शासन किया था। मंडला में ये कहीं पर “भुजिया” कहलाते हैं जो “भुइयाँ” का ही तत्सम शब्द है।
बिंझवार लगभग पूरी तौर से गैर आदिवासी हो चुके हैं। वे गोमांस नही खाते बिंझवार, नरोटिया और भारोटिया में रोटी-बेटी संबंध प्रचलित है, किन्तु इसमें स्थान-भेद से परिवर्तन पाए जाते हैं, जैसे साथ में भोजन करने की मनाही है, अर्थात तीनों में रोटी-बेटी के संबंधों का सीमित प्रचलन है। बालाघट में ऐसा कोई बंधन नहीं है। सभी उपजातियों में गोंड के प्रचलित गोत्र नाम अपितु सामान्य नाम भी गोंडों और बैगाओं में समान पाए जाते हैं। यह समानता दोनों आदिवासी जातियों के साथ-साथ रहने के कारण ही पायी जाती है। पुराने जमाने में दोनों आदिवासी जातियों में विवाह आम बात थी। एक गोंड युवती के बैगा से विवाह करने पर वह समान् स्वीकृत बैगा महिला मान ली जाती थी, किन्तु बिंझवार, भारोदिया और नरोटिया अब स्वयं अन्य बैगा उपजातियों में भी विवाह नहीं करते अस्तु गोंडों से विवाह करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यह तथ्य हमें राजगोंडों और राजवंशी गोंडों में भी मिलता है। दरअसल विकास की प्रक्रिया में आदिवासी जातियों में स्वाभाविक रूप से सामाजिक स्तर बन गए भले ही इसके पीछे धार्मिक बदलाव उतना नहीं जितना आर्थिक बदलाव है।
बैगा कृष्णवर्णीय और रूक्ष (कांतिहीन) शरीर वाले होते हैं। सिर के बालों को काटने का रिवाज नहीं है। कभी-कभी कपाल के ऊपर के बाल कुछ मात्रा में अवश्य काट लिए जाते हैं। बालों को इकट्ठा कर पीछे की ओर चोटी डाल ली जाती है। ये वर्ष में गिने चुने अवसरों पर ही स्नान करते हैं। बैगा युवतियाँ आकर्षक होती हैं। उनके चेहरे और आंखों की बनावट सुन्दर कही जा सकती है। इन्हें अन्य आदिवासी स्त्रियों से अलग पहचाना जा सकता है। यद्यपि गोंड और बैगा जंगलों में साथ रहते हैं, तथापि गोंडों में द्रविड़ विशेषताएं और बैगाओं में मुंडा विशेषताएं परिलक्षित होती हैं।

बैगाओं की प्रमुख उपजातियाँ
नरोतिया भरोतिया बिझवार नाहर राय भैना काढ़ भैना

निवास 

बैगा लोग सघन वन प्रान्तर में रहने के आदी हैं। उनके गांव छोटे होते हैं। कुछ बड़े गांव भी पाए जाते हैं जिनमें जनसंख्या 1000 या इससे अधिक होती है। ऐसे गांव अंग्रेजों के जमाने में बसाए गए थे। यह “फारेस्ट विलेज” (वन्य ग्राम) हैं। इनके बसाए जाने के पीछे उद्देश्य यह था कि अंग्रेज सरकार को जंगल कटवाने के काम के लिए लगभग मुफ्त की मजदूरी में श्रमिक मिल जाएं।
बैगा लोगों का मकान आठ से तेरह फुट तक चौड़ा एवं बीस से तीस फुट तक लम्बा होता है। दीवारें बांस की होती हैं जिन पर मिट्टी की छपाई कर दी जाती है। दरवाजा होता है पर खिड़की नहीं। खपरैल की जगह घास-फूस इस्तेमाल होता है। दरवाजों में किवाड़ नहीं लगाए जाते और और वह इतना छोटा होता है कि बिना झुके उसमें प्रवेश करना संभव नहीं। गांव के सभी मकान एक दूसरे से सटाकर बनाए जाते हैं। मकानों में रसोई घर काफी बड़ा होता है जो कि शयनकक्ष का भी काम देता है। बैगाओं के गांव सघन वनों के बीच में चौरस जमीन खोजकर बसा लिए जाते हैं, गांव की सीमा को अत्यंत साफ रखा जाता है। गांव की सीमा के बाहर मरघट और उसके समीप टोने-टोटकों का स्थान भी पाया जाता है। प्रतयेक गांव में बाहर से आने वाले लोगों को ठहराने के लिए एक पट्टी अलग बना दी जाती है।
बैगाओं की बस्तियां दिन के उजाले में भी सायं-सायं करती रहती हैं। क्योंकि वयस्क बैगा जंगल जा चुके होते हैं। केवल छोटे बच्चे घर के बाहर खेलते रहते हैं, शेर, तेन्दुए आदि का इनको कोई भय नहीं होता। शेर को ये अपना अनुज मानते हैं।
मंडला जिले में कहा जाता है कि बैगा मात्र ललकार से शेर की डाढ़ “बांध” सकते हैं इसलिए शेर बैगाओं को कभी नहीं छोड़ता और डाढ़ बांध रहने की हालत में शेर भूखा मर जाता है। इस मान्यता में सत्य की मात्रा बहुत कम है।

वस्त्राभुषण

बैगा पुरूष हाथ में कड़के के प्रकार का आभूषण पहनते हैं। स्त्रियां केवल विवाह के अवसर पर ही लकड़ी की खड़ाऊनुमा वस्तु धारण करती हैं। सिर के बालों पर फंदरी का भी आभूषण इस्तेमाल किया जाता है। बैगा महिलाएं नाक में कोई भी आभूषण नहीं पहनतीं। ज्ञातव्य है कि भारत में मुसलमानों के आने के पहले तक भारतीय महिलाएं नाक में कोई आभूषण धारण नहीं करतीं थी। यही कारण है कि इस युग के पूर्व तक के भारतीय मूर्ति-शिल्प में जहाँ दूसरे आभूषण का नामोनिशान नहीं मिलता। मुसलमानों ने मध्य एशिया के बर्बर राजाओं के गुलामों को नकेल डाले देखा था। अत: उन्होंने इसे कलात्मक रूप दे दिया। बैगा लोगों में नासिका भूषण की कमी यह बतलाती है कि ये लोग शेष समाज से पिछले लगभग एक हजार वर्षों से कटे हुए हैं।

समाज और अर्थव्यवस्था

बैगा सामाजिक दृष्टि से धुरगोडों के समान ही है। विधवा-विवाह, चमसेना इत्यादि प्रथाएं पायी जाती हैं। बैगा लोगों का जीवन अत्यंत सादा होता। आर्थिक सम्पन्नता की आकांक्षाए लगभग नहीं है। बाजार गया बैगा पैसे को जल्दी से जल्दी खर्च कर घर लोटना पसंद करता है। विवाह के अवसर पर वह हाथी पर बैठना अवश्य पसंद करता है, परन्तु आज की दरिद्रावस्था में वह खटिया का हाथी बनाकर आत्मसंतोष करता है। बैगा साज वृक्ष की पूजा करते हैं यदि पूजा करते समय उनके हाथ में साज के पत्ते दे दिए जाएं और उनसे कोई बात पूछी जाए तो वे कभी झूठ नहीं बोलते। गुनिया के गुणों पर उनकी अंधश्रद्धा पाई जाती है। वे अनेक देवी-देवताओं को भी मानते हैं। उनके दुल्हादेव और बड़ादेवा को यदि एक मुर्गी और एक बोतल दारू की पूजा चाहिए तो भवानी माता को चाहिए पूरा एक बकरा और दारू की बोतल। बाघेश्वरी और नागवंशी संतुष्ट होते हैं, एक सुअर और दो बोतल दारू से तो अजादी, मुर्गी और दो बोतल दारू से संतुश्ट हो जाती है। देवी-देवताओं की पूजा पुरूष ही करते हैं, स्त्रियां नहीं, फिर चाहे वे “खेर महारानी” ही क्यों न हो। बैगा किसी भी बंधन को पंसद नहीं करते फिर चाहे वह सम्पत्ति का बंधन ही क्यों न हो। यही कारण है कि वे जमीन के स्वामित्व का दायित्व आज भी नहीं निभा पाते हैं। लघु वनोपजों पर उनकी अर्थ व्यवस्था आज भी बहुत अधिक आश्रित है। बैगा लोग झाड़ फूंककर बीमारियों और सर्पदंश का इलाज करते हैं, परन्तु महाजनी का विषधर उन्हें सदियों से डस रहा है। जिसका इलाज न उनके स्वयं के मंत्रों में हैं और न ही हमारे आत्म केन्द्रित समाज के पास।

धार्मिक जीवन 

बैगाओं के प्रमुख देवता बूढ़ादेव हैं इनकी मान्यता है की ये शाल वृक्ष पर निवास करते हैं बैगालोग गाँव की रक्षा के लिए ठाकुर देव एवं बिमारियों से रक्षा के लिए दूल्हा देव की पूजा करते हैं बैगा ही गोंडो के परम्परागत पुरोहित होते हैं

बैगाओं में प्रचलित विवाह 

बैगाओं में प्रचलित नृत्य  

बैगाओं में प्रचलित  पर्व  

 पठौनी विवाह 

 सेला 

   

 मांगनी या चढ़ विवाह 

 करमा 

 करमा

 लमसेना विवाह 

फाग

 

 उठवा विवाह  

परधौनी 

   चोर विवाह 

  पैदलविवाह

 

 उधारिया

  


 सहरिया 

सहरिया

‘सहरिया’ शब्द पारसी के ‘सहर’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है- ‘जंगल’। इस जाति के लोग जंगल में निवास करते हैं। इन लोगों का परिवार पितृसत्तात्मक होता है। भारत सरकार ने सहरिया जनजाति को आदिम जनजाति माना है सहरिया जनजाति राजस्थान, मध्य प्रदेश के भिंड, ,मुरैना ,ग्वालियर, शिवपुरी ,और चंबल संभाग  में पायी जाती है इन संभागों के जिलों में इस जनजाति की जनसंख्या का 84.65 प्रतिशत निवास करता है। शेष भाग भोपाल, सागर, रीवा, इंदौर और उज्जैन संभागों में निवास करता है।

निवास स्थान

पुराने समय में यह समस्त क्षेत्र वनाच्छादित था और यह जनजाति शिकार और संचयन से अपना जीवन-यापन करती थी किंतु अब अधिकांश सहरिया या तो छोटे किसान हैं या मजदूर।सहरिया लोग क़तर बद्द माकन में रहते हे जिस सहराना कहते है इनका रहन-सहन और धार्मिक मान्यताएँ क्षेत्र के अन्य हिंदू समाज जैसी ही हैं किंतु गोदाना गुदाने की परंपरा अभी भी प्रचलित है। सहरिया जनजाति होने के कारण मोटे अन्न पर निर्भर हैं। शराब और बीड़ी के विशेष शौकीन है।
सहरिया लोगों के स्वास्थ्य परीक्षण का कार्य 2-3 वर्षों में (1990-92) सघन रूप से चला। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की शाखा आर.एम.आर.सी. के निदेशक डॉ. रविशंकर तिवारी बतलाते हैं कि सहरिया लोगों में क्षय रोग साधारण जनता की तुलना में कई गुना अधिक विद्यमान है, यह भ्रांति तोड़ता है कि क्षय रोग जनजातियों में कम पाया जाता है।

सहरिया लोग अपनी उत्पत्ति भीलों से मानते हैं। ये स्वयं को भीलो का छोटा भाई कहलवाना पसंद करते हैं

धार्मिक जीवन 

सहरिया कला और संस्कृति संपन्न जनजाति है  इनका रहन-सहन और धार्मिक मान्यताएँ क्षेत्र के अन्य हिन्दू समाज जैसी ही हैं

सहरियाओं में प्रचलित विवाह 

सहरियाओं  में प्रचलित नृत्य  

सहरियाओं  में प्रचलित  पर्व 

सहपलायन

लहकी

   

सेवा एवं क्रय विवाह

 दुलदुल घोड़ी

 

फाग

 

 

नृत्यरागनि

 
 सरहुल  

 

  तेजाजी की कथा (लोक गायन शैली)

 

 

  


 कोल 

कोल, मुण्डा समूह की एक अत्यंत प्राचीन जनजाति है  कोल जनजाति मध्य प्रदेश के रीवा, पन्ना एवं सतना ज़िलों में पाई जाती है। यह भारत की आदिम जनजातियों में गिनी जाती है। कौल जनजाति का उल्लेख ऋग्वेद ,मत्यस्य पुराण एवं रामायण आदि प्राचीन ग्रंथो में मिलता है कोल अपना संबंध शबरी से बताते हैं

कोल की प्रमुख उपजातियाँ
रोहिया  रोठेल

इसके अतिरिक्त भाड़तिया.दशोरा  ,माड़नहा,ताकुरिया ,रेवरिया और विंज हैं 

निवास

कोल काले रंग के होते है इनका कद मद्यम, होंठ, माथा , उभरा हुआ एवं बाल काले होते हैं ये अपने गांव अधिकांशतः खुले स्थान पर बसाते हैं इनके घर मिट्ठी के बने होते हैं जिनकी छत्त घास से बनाई जाती है घरो के मद्य मार्ग नह होते केवल पगडंडी होती है

वस्त्राभूषण

कोल जनजाति अन्य जातियों की तुलना में पुरे वस्त्र धारण करते हैं महिलाएं शारीरिक सज्जा पर विशेष ध्यान देती हैं गहनोंके साथ गुदना कोल स्त्रियों का मुख्य आभूषण है कोल शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों होते है ये लोग गाय एवं शेर का मांस नही खाते मद्यपान केवल त्यौहार के अवसर पर करते हैं

सामाजिक व्यवस्था

कोल समाज पित्रात्मक एवं गोत्रो के विभिन्न है इनमे टोटम का प्रचलन नहीं है इनमे पत्नी की मृत्यु के बाद विधवा या तलाक शुदा से विवाह का प्रावधान है कोल जाति के कई गांव की एक पंचायत (गोहिया ) होती है जो उनके बीच विवादों का निपटारा करती है

अर्थव्यवस्था

कोल अधिकांशतः खेतिहर मजदुर होते है पुरुष केवल बुवाई का काम करते ह अन्य काम महिलाएं करती हैं कृषि के अतिरिक्त कारखानों में मजदूरी तथा खदानों में मजदूरों के रूप में काम करते है

धार्मिक जीवन

हिन्दुओ के निकट सम्पर्क में रहने के कारण कोल हिन्दू देवी देवताओं की ही पूजा करते हैं इनमे फसलों की रक्षा के लिए सूर्य , चन्द्रमा ,पवन , तथा इंद्रकी पूजा की जाति है गंगा यमुना आदि नदियों की भी आराधना की जाती है  इसके अतिरिक्त ठाकुर देव ठुकराएँ दाई ,ज्वालामुखी ,भैरव बाबा ,बैरागी बाबा घमसान देव ,अहिरा बाबा ,संन्यासी देव  प्रमुख देवी देवता हैंये लोग जादू टोनेमें भी विश्वास रखते है एवं बिमारियों पर इलाज परम्परागत तौरसे करते ह मृत्यु पर तफनाने का रिवाज़ है

 

कोल में प्रचलित विवाह 

कोल में प्रचलित नृत्य  

कोल में प्रचलित  पर्व 

तलाक अथवा विवाह प्रथा 

दहका नृत्य 

   होली 

बहुविवाह 

 

 नवदुर्गा 
 

 रामनवमी 

 

  तीज 
   दशहरा

 

 

   

  


भारिया 

भारिया मध्य प्रदेश की जनजातियों में से एक है। इस जाति का विस्तार क्षेत्र छिंदवाड़ा, सिवनी, मंडला और सरगुजा ज़िले हैं। अपेक्षाकृत बड़े भाग में फैली इस जनजाति का एक छोटा-सा समूह छिंदवाड़ा ज़िले के पातालकोट नामक स्थान में सदियों से निवास करता रहा है। भारिया गोंडो को अपना बड़ा भाई मानते हैं  ।

भारिया की उपजातियाँ
भुइहार  भूमिया पैडो

निवास स्थल

पातालकोट स्थल को देखकर ही समझा जा सकता है कि इस स्थान की प्रगति नहीं हो सकी है। इस क्षेत्र के निवासी शेष दुनिया से अलग-थलग एक ऐसा जीवन जीते हैं, जिसमें उनकी अपनी मान्यताएँ, संस्कृति और अर्थ-व्यवस्था है। जिसमें बाहर के लोग कभी-कभार पहुँचते रहते हैं। ‘पातालकोट’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘पाताल को घेरने वाला पर्वत’ या ‘क़िला’। यह नाम बाहरी दुनिया के लोगों ने छिंदवाड़ा के एक ऐसे स्थान को दिया, जिसके चारों ओर तीव्र ढाल वाली पहाड़ियाँ हैं। इन वृत्ताकार पहाड़ियों ने मानों सचमुच ही एक दुर्ग का रूप ले लिया है। इस अगम्य स्थल में विरले लोग ही जा पाते हैं। ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र में एक ही जनजाति रहती है। पातालकोट की 90 प्रतिशत आबादी भारिया जनजाति की है। शेष 10 प्रतिशत में दूसरे आदिवासी आते हैं। इस स्थल की दुर्गमता ने ही यहाँ आदिवासी जीवन और संस्कृति को यथावत रखने में सहायता दी है।  पताल  कोट क्र भारिया को “जंगलियों के भी जंगली “कहा गया था 

मान्यता

सन 1981 की जनगणना में पातालकोट में भारिया को ‘जंगलियों के भी जंगली’ कहा गया था। भारिया शब्द का वास्तविक अर्थ ज्ञात नहीं है। कुछ लोगों का मत है कि अज्ञातवास में जब कौरवों के गुप्तचर, पांडवों को ढूंढ रहे थे, तब अर्जुन ने अभिमंत्रित र्भरूघास के शस्त्र देकर भारियों को गुप्तचरों से लड़ने को भेज दिया। इन्होंने विजय प्राप्त की और वहीं से इन्हें भारिया नाम मिला।

व्यवसाय

भारिया जनजाति का कृषि के उपरान्त खेतों में मज़दूरी करना प्रमुख कार्य है। पातालकोट के आसपास गोंडों के खेत फैले हुए हैं। भारिया पातालकोट से आकर इनके खेतों में भी काम करते हैं। एक अनुमान के अनुसार भारिया, गोंडों के खेतों में 60-70 दिनों से अधिक कार्य नहीं करते। शासकीय विकास कार्यों में भी वे मज़दूरी का काम कर लेते हैं।

कृषि

वर्ष 1881 से 1981 तक की शताब्दी में भारिया जनजाति में मामूली फ़र्क़ आया है। पिछले पच्चीस वर्षों से मध्य प्रदेश सरकार ने इस क्षेत्र की उन्नति के लिए लगातार प्रयास किए हैं। यहाँ तक कि पूरे पातालकोट क्षेत्र को विशेष पिछड़ा क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। पातालकोट की कृषि आदिम स्थाई कृषि है। कुल कृषि भूमि का 15 प्रतिशत खरीफ फ़सलों के अन्तर्गत आता है। प्रमुख फ़सलें धान, कोदो और कुटकी हैं। इन फ़सलों की कटाई अक्टूबर तक हो जाती है। यद्यपि रबी यहाँ की फ़सल नहीं है, किन्तु घर के आसपास के ख़ाली क्षेत्र में चना बो दिया जाता है। आदिवासियों के अनुसार चने की यह छोटी फ़सलें भी अत्यंत श्रम साध्य हैं, क्योंकि पातालकोट में बंदरों का उत्पात काफ़ी अधिक है और मौका पाते ही वे फ़सल को तबाह कर देते हैं। गेहूँ भी बोया जाता है, लेकिन इसका उत्पादन नगण्य है। पातालकोट में गेहूँ और चना नक़दी फ़सलें हैं, क्योंकि इस पूरे उत्पाद को बेच दिया जाता है, ताकि कुछ नक़द हाथ आ सके तथा अन्य जरूरत की वस्तुएँ ख़रीदी जा सकें।

धार्मिक जीवन

भारिया स्वयं को हिन्दू से प्रभावित मानते हैं  बूढ़ादेव इनके प्रमुख देवता है इसके अतिरिक्त दूल्हा देव ,सूरज देव नारायण देव आदि बी महत्वपूर्ण देवता है । भुमका इनका शमन या ओझा होता है । 

भारिया में प्रचलित विवाह 

भारिया में प्रचलित नृत्य  

भारिया में प्रचलित  पर्व 

तलाक अथवा विवाह प्रथा 

दहका नृत्य 

   होली 

बहुविवाह 

 

 नवदुर्गा 
   

 रामनवमी 

 

    तीज 
     दशहरा